Saturday, March 19, 2016

कर्मफल से सावधान


     मधु के नाम से जाना जाने वाला एक युवक ‘मधु विद्या’ की खोज में बद्रीनाथ के ऊपर हिमालय की कन्दराओं में साधनारत है। ‘मधु विद्या’ अर्थात् जिसको पाकर जीवन में मधुरता व आनन्द की कमी नहीं रहती। उपनिषदों में उच्चस्तरीय साधना को मधु विद्या, पंचाग्नि विद्या आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है। उग्र साधन में भीषण शीत को सहन करते हुए पाषाण की भाँति अडिग यह युवक अकेला अपने गुरु ‘श्री गुरु बालाजी’ के निर्देशनुसार ध्यान मगन है। तभी एक करुण पुकार उसके कानों से टकराती है। ‘त्राहि माम’ मुझे अपनी शरण दें प्रभु मुझे आपका सहारा चाहिए। बद्रीनाथ के कपाट बन्द हो चुके थे। यात्री अब नहीं आते फिर यह कौन भटक कर यहाँ आ पहुँचा। यह विचारकर नेत्र खोलते देखा कि अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति भूख, प्यास से निहाल, ठण्ड से काँपल युवा के समक्ष दण्डवत है। वेशभूषा से सूफी प्रतीत हो रहा था।
     युवक ने गुफा के भीतर से कम्बल, फल आदि लाकर उसके समक्ष रखे व कहा कि उसके पास आज यही है। खाओ व जहाँ से आए हो वहीं लौट जाओ। वह व्यक्ति बोला ‘‘मुझे शरण दे प्रभ, मुझे वचन दें कि आप मेरी साधना में मार्गदर्शन गुरु की भूमिका निभाएगें।’’ साधक कहता है- ‘‘तुम्हे यहाँ किसी ने भेजा, देखों तुम्हारे पैर ठण्ड से अकड रहे है, लहुलूहान है यह स्थान भयावह है भयानक हिमपात हो रहा है, जान प्यारी है तो वापस भाग जाओ।
     वह व्यक्ति पुनः निवेदन करने लगा- ‘मैं एक फकीर का शिष्य हँू। शरीर छोड़ते हुए उस फकीर ने मुझसे कहा कि उनके मरने के उपरान्त में बद्रीनाथ के ऊपर जो युवक साधना कर रहा है उनसे दीक्षा ग्रहण करूँ। वही युवक आगे का मार्ग दिखा सकता है। ‘‘कृपया मुझे अपनाकर कृतार्थ करें।’’
     अब युवक साधक बहुत कठोर हो गया ‘‘मतेच्छ! तुम तो माँसाहारी हो, तुम को क्या जानों? मैं तुम्हे स्वीकार कर अपना अमूल्य समय नष्ट नहीं कर सका ‘‘ऐसा न करे भगवन! बड़ी कठिनाई से आपको ढूढा है, मार्ग में प्राणों का मोह छोड़ कर आपकी द्वार आया हँू।’’ युवक चिल्लाया- ‘‘पर मैं तुम्हारी सहायता नही करुँगा, नीचे जाकर कोई और गुरु तलाश कर लो।’’ 
     ‘‘यदि आप मुझे ठुकरा देंगे तो अलकनन्दा में कूदकर अपनी जान दे दँूगा।’’ ‘‘तो मर जाओ मेरी बला से’’ वह युवक कठोरता से बोला। वह व्यक्ति पुनः निवेदन करने लगा’’ मैं आपके गुरु स्वीकार कर चुका हँू। आपकी आज्ञा शिरोधार्थ कर में अलकनन्दा में प्राणहुति दे रहा हँू। यह कहकर उस व्यक्ति ने छोछकर अलकनन्दा में कूद कर जीवन लीला समाप्त कर डाली।
     साधक के होश हवाश उड गए कि यह क्या हो गया। सही हुआ या गलत कुछ समझ नहीं आ रहा था। भारी मन से अपने गुरु ‘श्री बाबा जी’ को स्मरण करने लगा। शिष्य की करुण पुकार ‘बाबाजी’ के कानो में पहुँची। बाबाजी आकाश मार्ग से कुछ घण्टो पश्चात् वहाँ प्रकट हुए। ऐसे लगा मानो घिरती सांझ के झुटपुटे में उनकी उपस्थिति से अचानक उजाला हो गया। लंबे, गोरे लगभग यूरोपीय लोगों जैैसी रंगत वाले, बाबाजी के लम्बे फहराते बाल थे लगभग 16 वर्ष के युवा प्रतीत होते थे। एक धोती के अलावा उनका दृष्ट षृष्ट गठीला शरीर नंगा था। वे नंगे पैर बड़ी मनोरहता से चलते थे। आते ही वो स्थिति को भाँप गए। उनकी चमकती हुए बड़ी-बड़ी आँखें अपने युवा शिष्य मधु पर पड़ी, ‘‘बेटे। यह तुमने क्या भयकर कृत्य कर डाला। वह केवल ‘‘बाबाजी’’ कह सका व उसकी आँखों से आँसू बह निकले और वह उनके चरणों में गिर पड़ा ‘‘मेरे बच्चे अपने पर सयंम रखो, चलो तुम्हारी गुफा में चले है’’ दोनों ऊपर चढ़कर गुफा में पहुँचे ‘‘तुम्हे थोड़ा धैर्य दिखाना चाहिए था वह वृद्ध जो कहना चाह रहा था उसे ध्यान से सुनना चाहिए था। क्या एक पवित्र व्यक्ति की पहचान उसके बाहरी रंग रूप से की जा सकती है? एक क्षण में तुमने अपने इतने सातों के तप के पुण्य को गँवा दिया अब इसकी भरपाई करनी होगी।’’ बाबा जी आगे बोले-‘‘तुमने अपने अहंकरपूर्ण व्यवहार से उस व्यक्ति के दुख दिया है अब तुम भी उन दुःख दर्द और परेशनियों कठिनाईयों से गुजरो जिसका सामना उस फकीर ने किया था। खेचरी मुद्रा की अंतिम क्रिया करो ओर आज्ञा चक्र से अपने प्राणों के निकल जाने दो।’’
     आपकी इच्छा सदैव मेरे लिए आज्ञा रही है बाबाजी पर मेरी एक अन्तिम ईच्छा है।’’
     युवा शिष्य ने निवेदन किया। ‘‘बताओ मेरे बच्चे’’ बाबाजी ने पूछा।
     मैं अपने समस्त हृदय से आपको प्यार करता हँू। मैं आपसे मांगता हँू कि आप मेरी देखभाल करेंगे और अपने पावन चरणों में वापस ले आएँगें।
     ‘‘मैं यह वचन देता हँू’’ बाबाजी ने आश्वासन दिया।
He got his next birth in a Muslim family and his name is Mumtaj Ali Khan.
He is a great Yogi of International fame now a days using a nick name Shri M.

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विश्वमित्र- ‘आसुरी शक्तियों के सावधान’


  घटना सन् 2014 के प्रारम्भ की है जब मेरे अन्दर ‘साधना समर’ लिखने की प्रेरणा उत्पन्न हो थी। बसन्त पंचमी 2014 को अचानक मैंने सकंल्प किया कि साधना के ऊपर एक छोटी लगभग 150 पष्ठों की पुस्तिका निकालेंगे। यह बात मैंने अपने सहयोगी विशाल को बतायी। वह सहमत था कि पुस्तिका रखेंगे व गायत्री जयन्ती 2014 तक प्रकाशित कर देंगे। बसन्त पंचमी के उपरान्त अचानक प्रवाह बहुत तेज हो गया मुझे दिन, रात, कोलज आदि के कार्यों का ठीक से मन नहीं रहता था। खाना, पीना, नहाना इत्यादि का भी ध्यान नहीं रहता था। या तो जप चलता रहता था या लेखन। स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा था व विचित्र मानसिक स्थिति थी। ऐसी स्थिति में से सोचने लगा कि मुझे कोलज की नौकरी से रिटायरमेन्ट ;टत्ैद्ध ले लेना चाहिए क्योंकि लेखन व जप के अतिरिक्त कुछ करने का म नही नहीं करता था। अपने उदार स्वभाव के कारण मेरे पास कुछ भी ज्यादा पूँजी नहीं थी। फंड निकाल-निकाल कर या लोन लेकर पुस्तके छपती थी। मेरे परिवार के एक सदस्य मन में यह भय आ गया कि बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए यदि धन की आवश्यकता पड़ी तो कहाँ से आएगी यदि नौकरी छूट गयी तो हमारे पास पैसो की व्यवस्था नहीं थी क्योंकि साथ-साथ एक गौशाला भी सम्भाल रखी थी। जहाँ 50 से अधिक लाचार गाय थी। तभी अचानक एक घटना घटी। एक उच्च साधक मुझसे मिलने आए। मैं ओर विशाल दोनों कोलज में पुस्तक के कार्य में व्यस्त थे। 200 पृष्ठ पूरे होने जा रहे थे परन्तु लेखन का प्रवाह अन्तःकरण में बह रहा था। मेरे कोलज के कमरे में को साधक ध्यान मगन हो गए। कुछ समय पश्चात् उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि जिस पुस्तक का लेखन चल रहा है उसे हिमालय की देवशक्तियों का आर्शीर्वाद प्राप्त है। वह एक मोटी पुस्तक बनेगी व योगी कथामृत की तरह लोग उसे शौक से पंढे़गे। उन साधक का आश्वासन पाकर हम दोनों का मनोबल बढ़ गया साथ-साथ चिन्ता थी कि मोटी पुस्तक छपवाने के लिए धन दो लाख रूपया (2000 प्रतियों के लिए) कहाँ से आएगा। साथियों का सहयोग गौशाला के लिए पहले ही बहुत लिया जा चुका है। अब मैंने एक नया कार्य प्रारम्भ किया। कुछ उत्तीर्ण छात्रा जो नौकरी कर रहे थे व मुझसे मिलने आते थे उनसे मैंने दस-दस बीस-बीस हजार रूपये उधार माँगने प्रारम्भ किए। यह बात मेरे उस परिवार के सदस्य को भी पता चल गयी कि अब तो उधार भी सिर पर चढ़ने लगा है। यह बात वह सहन न कर पायें व मुझे इस तरह की मूर्खताएँ न करने की सलाह दी। मुझे उस समय किसी से कुछ भी सुनना, बात करना अच्छा नही लगता था। मेरे सिर पर तो कोई ओर भूत सवार था। रात्रि में कभी भी आँख खुलती तो लेखन प्रारम्भ हो जाता व घण्टो चलता। वह सदस्य अब विरोध पर उतर आय कि सेहत की हानि, धन की हानि कर पता नहीं क्या होगा? उसकी मानसिकता का लाभ उठाकर आसुरी शक्तियों ने उसको अपना माध्यम बनाना प्रारम्भ कर दिया। धीरे-धीरे क रवह ताकतवर व आक्रामक तेवर में आ गया। घर में कलह, अशन्ति व उत्पात बढ गए। मुझे अक्सर घर में लेखन करते हुए ब्रहम दण्ड लेकर बैठना पड़ता था ताकि आसुरी प्रवाह को रोका जा सके। बच्चे रोगी होने लगे, मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने लगा अभी तो 40 प्रतिशत कर्मा शेष था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इसे चालू रखा जाय तो बीच में छोड़ दिया जाय। एक दिन ऐसे ही वह सदस्य मुझ पर क्रोधित हो रहा था कि मैंने दुःखी होकर पूज्य गुरुदेव से कातर प्रार्थना की। अचानक एक असीम शन्ति का आभस हुआ। वह क्रोधित सदस्य भी शान्त हो गया व मेरे चरण स्पर्श कर चला गया। उसके पश्चात् घर में पूर्ण शन्ति, सहृदयता व निरोगिता धीरे-धीरे स्थापित होने लगी व पुस्तक के कार्य में तेजी आ गयी। किसी समय सन् 2005 में वह सदस्य उच्च साधक था व गुरुदेव की कृपा से असाध्य रोगों को दूर कर सकता था। परन्तु धीरे-धीरे कुछ लोगों के बहकावे में आकर साधना पथ से विचल गया। कहने का तात्पर्य है कि अनेक ऐसे साधक मैंने देखे जो किसी समय साधना की उच्च अवस्था में थे परन्तु कुछ समस्याओं के चलते आसुरी शक्तियों के चगंुल में फंस गए। यदि ऐसे साधको का वर्णन सविस्तार किया जाय तो एक मोटी पुस्तक तैयार हो जाएगी। इस समय यह नहीं कहा जा सकता कि इसकी कोई उपयोगिता है या नहीं। परन्तु इतना अवश्य है कि आसुरी शक्तियों इस प्रकार भ्रम उत्पन्न करती है कि तनिक भी असावधानी हमारा पतन कर डालती है।
     यह घटना यदि बुद्धि से सोचें तो एक मन गढ़न्त विवरण लगता है। कि एक ही घर में देव प्रवाह व आसुरी प्रवाह दोनों कैसे सम्भव? जब गुरुदेव ने मनुरा घर लिया था तो भूतो का निवास काफी समय तक बना रहा। ऐसा नहीं था कि गुरुदेव के घर में प्रवेश करते ही सारे भूत एकदम भाग गए हों। आसुरी शक्तियाँ विघन उत्पन्न करने के लिए सदस्य के एक मित्र के यहाँ डेरा डाले थी। जब वह सदस्य उस मित्र से मिलता था तो वह प्रवाह तेज हो जाता था। अतः साधक अपना मित्र उच्च मानसिकता वाले लोगों को ही बनाएँ।

Wednesday, March 16, 2016

स्वामी विशुद्धानन्द (श्रीगुरुकृपा-स्मृति)


  
श्री जीवनधन गांगुली
            मैं श्रीगुरुदेव का एक अदना शिष्य हँू। पूर्वजन्म के किसी पुण्य के बल से मुझे श्रीचरणों की प्राप्ति हुई थी। यद्यपि मैंने चैबीस परगने के बेलघरिया गाँव के प्रसिद्ध गांगुली वंश में जन्म लिया था, भाग्य के दोष से छह साल के बाल्य-जीवन में ही मुझे पिता का वियोग प्राप्त हुआ। पुण्यशीला मेरी माताजी के अतिरिक्त अन्य कोई अभिभावक न होने के कारण मेरी बहुत-सी सम्पत्ति नष्ट हो गयी थी। यहाँ तक कि बचपन मे तरह-तरह के रोगों के कारण मरणासन्न हो गया था। जब मेरी उम्र पन्द्रह साल की थी तब कलकत्ते में पहले-पहल बेरी-बेरी रोग देखने में आया था और मुझे वह रोग हो गया था-मेरे बचने की कोई आशा नहीं थी। उसी समय मेरे बाएँ कन्धे की पेशी में पक्षाघात हो गया। बायाँ हाथ अशक्त हो गया। कलकत्ते के तत्कालीन सुप्रसिद्ध डाॅक्टरों ने चिकित्सा की, किन्तु कोई फल नहीं हुआ। कलकत्ता मेडिकल काॅलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल डाॅक्टर कर्नल कालबर्ट ने अपने सहकर्मी कर्नल वार्ड आदि चार प्रसिद्ध डाॅक्टरों के साथ मेरी परीक्षा करके कहा था कि यह रोग असाध्य है और दायीं-बाँह पर भी इसके आक्रमण की सम्भावना है। तब मैं पंगु हो जाऊँगा बल्कि मेरे जीवन के खत्म हो जाने की आशंका है। अनेक प्रसिद्ध ज्योतिषियों द्वारा मेरी जन्मकुण्डली पर विचार करने पर मालूम हुआ था कि 23 वर्ष की आयु में मेरी अकाल मृत्यु का योग है। इसी समय श्रीगुरुदेव ने मेरे छोटे मौसा (कलकत्ते के बहुत प्रसिद्ध व्यवसायी श्रीउमेशचन्द वन्द्योपाध्याय) के घर अपनी चरण-धूलि दी। इस सुअवसर पर मेरी मौसीजी ने बहुत कातर होकर श्रीगुरुदेव को मेरे बारे में बताया और श्रीबाबा ने मुझ पर कृपा दृष्टि डाली। मेरे सौभाग्य से कुछ दिन बाद ही उन्होंने मुझे दीक्षा दी और दीक्षा सम्पन्नहो जाने पर बताया कि मेरे जीवन को अब कोई खतरा नहीं। साथ ही यह भी बताया कि बड़े-बड़े डाॅक्टर चाहे जो कहें, मेरे जीवन का अन्त नहीं होगा और मैं दिनों-दिन स्वस्थ होता हुआ अपने काम करने लगूँगा। बड़े आश्चर्य की बात है कि मेरी दीक्षा के बाद मेरा शरीर स्वस्थ होने लगा था और मैं दो साल में ही अच्छी तरह कोई भी कार्य सम्पन्नकरने योग्य हो गया था। यहाँ इस बात का उल्लेख कर देना ठीक होगा कि 23 साल की वय में मैं अपनी मौसी के साथ धाम में वायु-परिवर्तन के लिए गया था। वहीं मैं टायफायड से आक्रान्त हो कर लगभग मौत के मुँह में जा पहुँचा था। उस समय वहाँ के सिविल सर्जन डाॅ. पुलीपाका ने मेरी दवा की थी और एक दिन मेरी मरणासन्न दशा देखकर मेरे जीवन की आशा छोड़ दी थी। इस पर मेरी मौसी आदि सबने रोना-पीटना शुरू कर दिया, किन्तु उसी समय मैंने ऐसा अनुभव किया था और तुरन्त चेतना प्राप्त करके मैंने कहा, ‘मेरे जीवन की रक्षा होगी, तुम सब रोओ नहीं।दूसरे ही दिन श्री गुरुदेव का एक अभयदानी पत्र भी मुझे मिला था। उसके बाद से मेरा शरीर क्रमशः ठीक होने लगा था और कुछ दिनों बाद तो मैं विशेष हष्ट-पुष्ट और बलवान् हो गया था। बाबा की कृपा से मेरी आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी थी। दीक्षा के बाद बाबा मेरे जीर्णशीर्ण घर में पधारे थे और उसी समय मेरे मौसेरे जीजा खिदिरपुर-निवासी श्री सतीशचन्द्र मुखोपाध्याय, कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील (पूर्वोक्त श्री उमेशचन्द्र वन्द्योपाध्याय के जामाता) ने उन्हें मेरे पूर्वजों की अट्ठालिका के ध्वस्त हो जाने का विवरण दिया। सुनकर श्री बाबा ने कहा था कि भवन का निर्माण फिर होगा और जो भूमि और सम्पत्ति नष्ट हो गयी है वह सब भी मिलेगी। उस समय की अपनी शारीरिक और आर्थिक दशा को देखते हुए मैं सोच भी नहीं सकता था कि यह सब होना सम्भव है। किन्तु आश्चर्य की बात है कि श्री श्रीगुरुदेव की कृपा और उनकी शुभकामना से सात-आठ साल के भीतर ही मेरे पैत्रिक सिंहासन का पुनर्गठन हो गया था तब बर्बाद भूमि और सम्पत्ति के अधिकांश का पुनरुद्धार हो गया था और, और भी नई सम्पत्ति की प्राप्ति भी हुई थी। 

महाभारत-काल के अग्रि-बाण का प्रत्यक्ष प्रदर्शन

            एक दिन की बात है कि झाल्दा (पुरुलिया के पास) के राजा श्री उद्धवनारायण सिंह ने (जो बाबा के शिष्य और हमारे गुरुभाई थे) श्री बाबा से कहा कि ऋषि वेदव्यास जी ने लिखा है कि महाभारत में अग्रि-बाण तथा वायु-बाण का प्रयोग किया गया था। क्या यह बात सच है?
            बाबा बोले- हाँ, बिल्कुल सच है। क्या तुम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहते हो?
            उद्धव सिंह बोले-गुरुदेव, यदि दिखा दें तो बड़ी कृपा होगी।
            गुरुदेव ने कहा-सामने जो सरकण्डे लगे हैं उनमें से तीन काटकर मेरे पास ले आओ। तब तीनों में से एक सरकण्डे का छिल्का उतरवाकर उसका एक धनुष बनाया। फिर कुछ मन्त्र पढ़ें और वह धनुष धातु का सुन्दर धनुष बन गया। अब दूसरे सरकण्डे को अभिमन्त्रित किया, वह स्टील का पैनी नोक वाला पुष्ट तीर बन गया।
            बाबा बोले-देखो, यह एक सामान्य तीर और कमान है।
            अब मन्त्र द्वारा बाबा ने अग्रि देवता को अभिमन्त्रित करके तीर की नोक में प्रवेश कर दिया। फिर इस बाण को धनुष पर चढ़ाकर बाबा ने उसे सामने खड़े एक बड़े बरगद के वृक्ष पर छोड़ दिया।
            क्षणमात्र में वह बाण अत्यन्त घोर ध्वनि करता हुआ बड़े वेग के साथ उस बरगद के पेड़ को चीरता हुआ पार कर गया तथा उस वृक्ष में तुरन्त आग लग गई। बाबा बोले कि पूरा फायर-ब्रिगेड भी इस पेड़ की अग्रि को शान्त नहीं कर सकता।
            फिर उन्होंने तीसरा सरकाण्डा लिया और उसका तीर बनाकर उसे भी अभिमन्त्रित किया। तदुपरान्त उस तीर की नोक पर वरुण देवता का आवाहन एक और मन्त्र द्वारा किया।
            इस तीर को धनुष पर चढ़ाकर उन्होंने जब उपर्युक्त प्रचण्ड जलते हुए बरगद के पेड़ पर छोड़ा तो देखते ही देखते पेड़ की आग बुझ गई।
            तदुपरान्त बाबा ने फिर एक मन्त्र पढ़ा तो वे धनुष तथा बाण एक बार फिर से तीन सरकण्डे बन गये।

Monday, March 14, 2016

प्र्रेरक प्रसंगः

    विचार ही नही कार्य भी कीजिए

विचारों और क्रियाओं का संतुलन जब बिगड़ जाता है तब मनुष्य का मानसिक संतुलन भी सुरक्षित नही रह पता. इससे होता यह है की जब वह भूमि पर अपनी वैचारिक परिस्थितियों को नही पाता, तो उसका दोष समाज के मत्थे मढ़कर मन ही मन एक द्वेष उतपन्न कर लेता है।  समाज का कोई दोष तो होता नही।  अरस्तु उसको खुलकर कुछ न कह पाने के कारण मन ही मन जलता, भुनता और कुढ़ता रहता।  इस प्रकार की कुण्ठापूर्ण जिंदगी उसके लिए एक दुखद समस्या बन जाती है।  अपनी प्यारी कल्पनाओं को पा नही पातायथार्थता से लड़ने की ताकत नही रहती और समाज का कुछ बिगाड़ नही पाता , ऐसी दशा में एक अभिशाप पूर्ण जीवन का भोझ धोने के अतिरिक्त उसके पास कोई चारा नही रहता।
इसके विपरीत जिन बुद्धिमानों की विचारधारा संतुलित है, उसके साथ कर्म का समन्वय है, वे जीवन को सार्थक बनाकर सराहनीय श्रेय प्राप्त करते है।  जीवन में कर्म को प्रधानता देने वाले व्यक्ति योजनाएँ कम बनाते हैं और काम अधिक किया करते हैं।  इन्हे व्यर्थ - विचारधारा को विस्तृत करने का अवकाश ही नही होता।  एक विचार के परिपुष्ट होते ही , वे उसे एक लक्ष्य की तरह स्थापित करके क्रियाशील हो उठते है , और जब तक उसकी प्राप्ति नही कर लेते , किसी दूसरे विचार को स्थान नही देते।

    बच्चों के निर्माण का दायित्व

तुम्हारे गृह में पदार्पण करने वाले तुम्हारे आत्मस्वरूप ये बालक समाज और देश का निर्माण करने वाले भावी नागरिक है।  ईश्वर की और से तुम्हारा यह कर्तव्य है की उनकी सुशिक्षा एवं आत्मपरिष्कार की समस्याओं में दिलचस्पी लो। 
जैसा वातावरण तुम्हारे घर का है , उसी साँचे में ढल कर तुम्हारी संतानो को मानसिक संस्थान , आदतें , सांस्कृतिक स्तर का निर्माण होगा।  जब तुम अपने भाइयो के प्रति दयालु , उदार और संयमी नही हो , तो अपनी संतान से क्या आशा करते हो की वे तुम्हारे प्रति प्रेम दिखलाएँगे।  जब तुम अपना मन विषय -वासना , आमोद -प्रमोद तथा कुत्सित -इच्छाओं से नही रोक सकते , तो भला वे क्यों न कामुक और इन्द्रियलोलुप होंगे।  यदि तुम मॉस , मद्य या अन्य अभक्ष्य पदार्थों का उपयोग करते हो , तो वे भला किस प्रकार अपनी प्राकृतिक पवित्रता और दूध जैसी निष्कलंकता को बचाए रख सकेंगे। 
तुम्हारे शब्द , व्यवहार , दैनिक कार्य , सोना , उठना -बैठना ऐसे साँचे है , जिनमें उनकी मुलायम प्रकृति और आदतें ढाली जाती हैं।  वे तुम्हारी प्रत्येक सूक्ष्म बात देखते और उनका अनुकरण करते हैं।  तुम उनके सामने एक मॉडल , एक नमूना या आदर्श हो।  इसलिए यह तुम्ही पर निर्भर है की तुम्हारी संतान होगी मनुष्य या मनुष्यकृति वाले पशु।

    जीवन कलात्मक ढंग से जीयें

श्जिंदगी जीना एक कला है श्- ऐसा सुनकर लोगों को  अजीब - सा लगता है , किंतु है यह वास्तविकता की जीवन एक कला है।  जो लोग जीवन जीने की कला नही जानते अथवा उसे कलात्मक नही मानते , वे जीते हुए भी ठीक से नही जी पाते। 
बहुत लोग जिंदगी को विविध उपकरणों से सजाए सँवारे रहने की कला समझते हैं , किंतु बाह्य प्रसाधनों द्वारा जीवन का साज शृंगार किए रहना कला नही है।  यह मनुष्य की लिप्सा है, जिसे पूरा करने में उसे एक जूठ सतोष का आभास होता है।  फलतः यह मान बैठता है की वह जिंदगी को ठीक से जी रहा है।  कला तो वास्तव में वह मानसिक वृति है जिसके आधार पर साधनों की कमी में भी जिंदगी को खूबसूरती के साथ जिया जा सकता है।  जिंदगी को हर समय हँसी -खुशी के साथ अग्रसर करते रहना ही कला है , और उसे रो -झींक कर काटना ही कलहीनता है।
साधन अथवा असाधन , सम्पन्नता अथवा विपन्नता किन्ही भी स्थितियों में अनुरूप अथवा आवशयक पुरुषार्थ के साथ सहजता , सरलता , संतोष, आशा , उत्साह तथा अव्यग्रतापूर्ण हर्ष विषाद का यथायोग्य निर्वाह करते हुए जीना ही कलापूर्ण जीवन है जिसे प्राप्त करना न केवल श्रेयस्कर ही है , बल्कि सार्थक एवं सुखकर भी है।

बच्चों के निर्माण का दायित्व

तुम्हारे गृृह मे पदार्पण करने वाले तुम्हारे आत्म स्वरूप ये बालक समाज और देश का निर्माण करने वाले भावी नागरिक है। ईश्वर की ओर से तुम्हारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुशिक्षा एवं आत्म परिष्कार की समस्याओं में दिलचस्पी लो।
        जैसा वातावरण तुम्हारे घर का है उसी सांचे मे ढलकर तुम्हारी संतानो का मानसिक संस्थान, आदते, सांस्कृतिक स्तर का निर्माण होगा। जब तुम अपने भाईयों के प्रति दयालु उदार और संयमी नही हो। तो अपनी संतान से क्या आशा करते हो कि वे तुम्हारे प्रति प्रेम दिखलायेंगे। जब तुम अपना मन विषय वासना आमोद प्रमोद तथा कुत्सित इच्छाओं से नही रोक सकते तो भला वे क्यों न कामुक और इन्द्रिय लोलुप होंगे। यदि तुम मांस, मध या अन्य पदार्थो का उपयोग करते हो तो वे भला किस प्रकार अपनी प्राकृतिक पवित्रता और दूध जैसी निष्कलंकता को कैसे बचाए रख सकेंगे। यदि तुम अपनी अशलील और निर्लज आदतों , गन्दी गालियां , अशिष्ट व्यवहारों को नही छोडते, तो भला तुम्हारे बालक किस प्रकार गन्दी आदते छोड सकेंगें।
       तुम्हारे शब्द व्यवहार दैनिक कार्य, सोना , उठना बैठना ऐसे सांचे है जिनमे उनकी मुलायम प्रकृति और आदते ढाली जाती है। वे तुम्हारी प्रत्येक सूक्ष्म बात देखते और उनका अनुकरण करते है। तुम उनके सामने एक माडल, एक नमूना या आदर्श हो इसलिये यह तुम्ही पर निर्भर है कि तुम्हारी संतान होगी मनुष्य या मनुष्याकृति वाले पशु।

जीवन कलात्मक ढंग से जीएॅ

जिन्दगी जीना एक कला है ऐसा सुनकर अनेक लोगो को अजीब सा लग सकता है। किन्तु है यह वास्तविकता कि जीवन एक कला है। जो लोग अपने जीवन की कला नही जानते अथवा उसे कलात्मक कर्तव्य नही  मानते । वे जीते हुए भी ठीक से नही जी पाते।
बहुत लोग जिन्दगी को विविध उपकरणों से सजाए सवांरे रहने को ही कला समझते है। किन्तु बाहय प्रसाधनों द्वारा जीवन का साज श्रंृृगार किये रहना कला नही है। यह मनुष्य की लिप्सा है। जिसे पूरा करने में उसे एक झूठे सन्तोष का आभास होता है। फलतः यह मान बैठता है कि वह जिन्दगी को ठीक से जी रहा है। कला तो वास्तव में वह मानसिक वृत्ति है जिसके आधार पर साधनों की कमी में भी जिन्दगी को खूबसूरती के साथ जिया जा सकता है। लाल बहादुर शास्त्री जी इसके उदाहरण है। जिन्दगी को हर समय हंसी खुशी के साथ अग्रसर करते रहना ही कला है। और उसे रो झीककर काटना ही कलाहीनता है।
      साधन अथवा असाधन सम्पन्नता अथवा विपन्नता किन्ही भी स्थितियों में अनुरूप अथवा आवश्यक पुरूषार्थ के  साथ सहजता सरलता सन्तोष आशा उल्लास तथा हर्षविषाद का यथायोग्य निर्वाह करते हुए जीना ही कलापूर्ण जीवन है जिसे प्राप्त करना न केवल श्रेयस्कर ही है। बल्कि सार्थक और सुखकर भी हैं।

चरित्र एक अनमोल रतन

चरित्र मनुष्य का अनमोल धन है।  हर उपाय से इसकी रक्षा करनी चाहिए। किसी की धन -दौलत , जमीन -जायदाद , व्यवसाय , व्यापार चला  जाये , तो उद्योग करने से पुनः प्राप्त हो सकता है , किंतु जिसने प्रमाद अथवा असावधानी वश एक बार भी अपना चरित्र खो दिया , तो फिर वह जीवन भर के उद्योग से भी अपने उस धन को वापस नही पा सकता।  आगे चलकर वह अपन भूल सँभाल तो सकता है , अपना सुधार तो कर सकता है , अपनी सच्चरित्रता के लाख दे सकता है , किंतु फिर भी वह एक बार का लगा हुआ कलंक अपने जीवन पर से धो नही सकता।  उसके लाख सँभल जाने , सुधर जाने पर भी समाज उसके उस पूर्व पतन को भूल नही सकता और इच्छा होते हुए भी उस पर असंदिग्ध विश्वास नही कर सकता।  एक बार चारित्रिक पतन मनुष्य को जीवन भर के लिए कलंकित कर देता है। इसलिए तो विद्वानों का कहना है कि मनुष्य का यदि धन चला गया तो  नहीं  गया , स्वास्थ्य चला गया तो कुछ गया और यदि चरित्र चल गया तो सब कुछ चला गया।  इस लोकोक्ति का अर्थ है की धन -दौलत तथा स्वास्थ्य आदि  को फिर पाया जा सकता है , किंतु गया हुआ चरित्र किसी भी मूल्य पर दुबारा नही पाया जा सकता।  इसलीये मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है कि वह संसार में मनुष्यता पूर्ण जीवन जीने के लिए हर मूल्य पर , हर प्रकार से , हर समय , अपनी चरित्र रक्षा के लिए सावधान रहे। 

जीवन एक वरदान

असुरों से सभी घृणा करते है, क्योंकि उनकी भावनाओं मे स्वार्थपरता और भोग लालसा इतनी प्रबल होती है। कि वे इसके लिये दूसरो के अधिकार, सुख और सुविधाएं छिन्न लेने में कुछ भी संकोच नही करते। उनके पास रहने वाले भी दुखी रहते है। और व्यक्तिगत बुराईयों के कारण उनका निज का जीवन अशान्त होता ही है। दुख की यह अवस्था किसी को भी सुखी नही होने देती।

  हम सुख भोगने के लिये इस संसार में आये है दुखों से हमे घृणा है, पर सुख के सही स्वरूप को भी तो समझना चाहिये। इन्द्रियों के बहकावे में आकर जीवन पथ से भटक जाना मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के लिये श्रेयस्कर नही लगता। इससे हमारी शक्तियां पतित होती है। अशक्त होकर भी क्या कभी सुख की कल्पना की जा सकती है। भौतिक शक्तियों से सम्पन्न व्यक्ति का इतना सम्मान होता है कि सभी लोग उसके लिये छटपटाते है। फिर आध्यातिमक शक्तियों की तो कल्पना भी नही की जा सकती । देवताओं की सभी नतमस्तक होते है। क्योकि उनके पास शक्ति का क्षय कोष माना जाता है । हम अपने देवत्व को जाग्रत करे तो वैसे ही शक्ति की प्राप्ति हमें भी हो सकती हैं। तब हम सच्चे सुख की अनुभूति भी कर सकेंगें और हमारा मानव जीवन सार्थक होगा। हमे असुरों की तरह नही देवताओं की तरह जीना चाहिये। देेवत्व ही इस जीवन का सर्वोत्तम वरदान है । हमें इस जीवन को वरदान की तरह ही जीना चाहिये।

Wednesday, March 9, 2016

रक्त चाप प्रबन्धन (Blood Pressure Management ) Part-II

विज्ञानमय कोष

 विज्ञानमय कोष वह आयाम अथवा स्तर है जहाँ पर षट चक्रो की साधना का विज्ञान प्रारम्भ हो जाता है। जो उपलब्धियाँ भौतिक विज्ञान के द्वारा उपलब्ध हो सकती है अर्थात् जो शक्ति, जो सामथर्य मानव ने Science & Technology  द्वारा अर्जित की हैं वो सभी विज्ञानमय कोष की साधना से भी सम्भव हैं। इनको शास्त्रों में ऋद्धि सिद्धियों की संज्ञा दी गयी है। उदाहरण के लिए विज्ञान के द्वारा विश्व के किसी कोने में बात कर सकते हैं तो विज्ञानमय कोष का साधक विश्व में कहीं भी सन्देश परा वाणी के द्वारा सम्प्रेषित कर सकता है। हवाई जहाज द्वारा कहीं भी जाया जा सकता है तो सूक्ष्म शरीर के द्वारा कहीं भी भ्रमण सम्भव है। जैसे विज्ञान के यदि कोई उच्च स्तरीय प्रयोग करना चाहता है तो वैज्ञानिक के मार्गदर्शन में व्यक्ति अनेक वर्षों तक सीखता है यदि स्वयं व्यक्ति कम्प्यूटर बनाना चाहे तो यह असम्भव है। इसी प्रकार विज्ञानमय कोष की सफलता स्वयं के बूते सम्भव नहीं होती। गुरु कृपा, ईश्वर कृपा अर्थात् मार्गदर्शन, संरक्षण, नियन्त्रण की आवश्यकता होती है।
 षट चक्रों में मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व से सम्बन्धित है, स्वाधिष्ठान चक्र जल तत्व का अधिष्ठाता है, नाभि चक्र अग्नि तत्व, अनाहत वायु तत्व व विशुद्धि चक्र आकाश चक्र के प्रतिनिधि है। इस प्रकार पंचतत्वो का सन्तुलन बनाने के लिए पाँच चक्रो की ऊर्जा को सही करना होता है यदि चक्रो की ऊर्जा सन्तुलित है, उध्र्वगामी  है तो जटिल रोगो को  आने की सम्भावना बहुत ही कम होती है। यदि दुर्भाग्यवंश व्यक्ति कही फंस जाया तो चक्रो के द्वारा रोग मुक्ति बहुत सरलता से हो जाती है। SIGFA Healing के प्रणेता बी. चन्द्रशेखर एक समय तीन भयानक रोगों से आक्रान्त हो गए थे- मधुमेह, कैंसर व हिपेटाइप्स । इस विषम समय में वो जीवन की आशा छोड़ चुके थे। चिकित्सको ने जवाब दे दिया था। तभी अचानक उनको विज्ञानत्मक कोष की इस विलक्षण पद्यति का ज्ञान हुआ। आज वो विश्व के जाने माने हीलर हैं।
 उच्च रक्त चाप का रोगी सहस्त्रार चक्र, आज्ञा चक्र पर व स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान करे। आज्ञा चक्र से मानसिक शन्ति व स्वाधिष्ठान चक्र से जल तत्व की प्रचुरता बनी रहती है। रक्त चाप के रोगो में अग्नि तत्व असन्तुलित होता है। उसके सन्तुलन के लिए जल तत्व को बढ़ाना होता है। इसके लिए पर्याप्त स्पुनपक कपमजे भी लेनी चाहिए। सहस्त्रार चक्र ब्यान प्राण को मजबूत बनाता है। सम्पूर्ण शरीर में रक्त का परिसंचरण ब्यान प्राण के द्वारा होता है। ब्यान प्राण का उदगम व भण्डारण सहस्त्रार चक्र है। सहस्त्रार इस प्राण को स्वाधिष्ठान पर छोड़ता है। यहाँ से यह सारे शरीर में फैल जाता है।

             ऊपर के चक्रो की frequency  बहुत अधिक होती है अतः इनको जाग्रत करने के लिए High frequency मन्त्र जैसे गायत्री मन्त्र ही कामयाब हैं। अतः 20 मिनट गायत्री मन्त्र का जप सूर्य ध्यान करते हुए आज्ञा चक्र पर करें व 20 मिनट गायत्री जप सहस्त्रार पर करें। इस प्रकार 40 मिनट जप ऊपर के चक्रो पर करें। अब इसके पश्चात् 20 मिनट जप स्वाधिष्ठान पर मृत्युजंय मन्त्र के साथ करें। प्रारम्भ में जब जप चक्रों पर करते हैं तो यह कठिनाई होती है कि कैसे सम्भव होगा। परन्तु समय के साथ चक्र जप की ऊर्जा से झंकृत होना प्रारम्भ हो जाते हैं। इस समय यह स्पष्ट हो जाता है कि कौन से चक्र पर जप किया जा रहा है। चक्रो के जागरण के साथ ही ध्यान की परिपक्वता, सार्थकता व आनन्दानुभूति का आभास साधक को होने लगता है।
 यह ध्यान रहे कि ऊपर के चक्र पहले जाग्रत हों, नीचे वाले बाद में या साथ-साथ यदि नीचे के चक्र पहले जाग्रत होते हैं तो ऊर्जा के ऊध्र्वगमन में कठिनाई आती है। यदि ऊपर के चक्र पहले जाग्रत हो जाएँ तो वो ऊर्जा के नीचे से ऊपर खींचते रहते हैं। प्राचीन काल में साधक नीचे से प्रारम्भ करते थे। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर व अनाहत पर साधना करते अनेक साधक पाए जाते थे। यदि नीचे के चक्रों में ऊर्जा पर्याप्त है तो व्यक्ति शरीर बल व प्राण बल का धनी होता था। मूलाधार की मजबूती से शरीर भीम के समान विशालकाय हो सकता है व अनाहत की मजबूती से साधक पवन पुत्र के सामन वेगवान, गतिमान हो सकता है। आज पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण वातावरण बहुत प्रदूषित हो चुका है अतः यदि नीचे के चक्र जाग्रत हों तो यह ऊर्जा निम्नगामी होकर साधक वीरभाव से धनी होगा व अनेक प्रतिभाओं का स्वामी। आज्ञा चक्र व सहस्त्रार चक्र साधक में स्वतः ज्ञान, वैराग्य व संयम की उत्पत्ति करते हैं। अतः इस युग में इनका जागरण आवश्यक है यदि ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से नहीं हो रही है। वासनाओं को नियत्रित करने के लिए व्यक्ति के संघर्ष करना पड़ रहा है। युद्ध थोडे समय ही ठीक रहता है। लम्बे युद्ध अथवा वे कठिन संघर्ष किसी न किसी विकृति या रोग की उत्पत्ति कर देते हैं। अतः आज्ञा चक्र का जागरण कर इसका कमाल देंखे।
 परन्तु यदि हाथी के समान बलवान व विशाल शरीर चाहिए तो मूलाधार ही बड़ा करना होगा, मूलाधार की ही साधना करनी होगी। शास्त्रों में कहा जाता है कि प्रत्येक चक्र का एक देवता होता है। मूलाधार चक्र करे देवता गणेश जी हैं। गणेश जी का शरीर विशालकाय है व मंगलमूर्ति हैं। उनका मस्तक हाथी का उपमा देता है। हाथी चंचल कम होता है जिसका शरीर तगड़ा, मोटा होता है वह भी चंचल कम होगा। पतला दुबला व्यक्ति ज्यादा चंचल होता है। भरा शरीर पूरे समाज के लिए मंगलमय है। अच्छे Physical Structure के मनुष्य को देखते ही सभी में प्रसन्नता की लहर दौड़ती है। उत्तम स्वास्थ्य समाज के मंगल के लिए अत्यधिक आवश्यक है। ज्ञान कितना भी क्यों न हो यदि शरीर बढि़या नहीं है तो मानव का कल्याण कहाँ? परन्तु सुख, सुविधा, ज्ञान भले ही कम हो शरीर अच्छे हों हरे भरे हों तो वह समाज निश्चित रूप से प्रसन्न होगा। आज सुख सुविधाओं के साधन Google की information अपने पास सब कुछ हैं परन्तु अच्छा स्वास्थय न होने से सब फीका-2 रहता है।  

आनन्दमय कोष

 आनन्दमय कोष नामानुसार व्यक्ति के आनन्दमय बना देता है महात्मा बुद्ध, श्री अरविन्द, महर्षि रमण जैसे सहस्त्रार सिद्ध स्तर के व्यक्ति इस श्रेणी में आते है। 


High Blood Pressure Management Part-I

उच्च रक्त चाप को नियन्त्रित करने के लिए कोई भी आदर्श औषधि उपलब्ध नहीं है। जो औषधियाॅं हैं वो या तो रोग की प्रथम अवस्था (अर्थात् 1st stage ) में ही प्रभावी हैं अथवा अनेक प्रकार के दोषों और प्रतिकूल प्रभावों से युक्त हैं। जिनमें से कुछ तो अत्यन्त गम्भीर प्रभाव डालती हैं। उनकी विषाक्तता अन्य अनेक प्रकार के गम्भीर रोगों को जन्म दे सकती है। एक ओर व्यक्ति इनका गुलाम हो जाता है तो दूसरी ओर इनके खतरनाक दुष्प्रभावों से कराह उठता है। यह ऐसी स्थिति है आगे कुआ पीछे खाई। अनेक व्यक्ति इन दवाओं के नरक से बचने के लिए पाॅंच-सात दिन के लिए इनको लेना छोड़ देते हैं। परन्तु लकवा के शिकार होकर दूसरे बड़े नरक में जा फंसते हैं। लेखक के पिता जी भी इसी तरह दवा से तंग होकर कुछ दिनों के लिए दवा छोड़ बैठे। उनको right side paralysis  का कष्ट पूरे 13 वर्ष भोगना पड़ा।
     इस जटिल रोग के निवारण हेतु धैर्यआत्मविश्वाससूझबूझ बहुत सहायक होता है। सर्वप्रथम रोगी को इस विषय में पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक है। साथ-साथ अच्छे मार्गदर्शक से समय-समय पर सलाह लेना भी लाभप्रद होता है। बड़ी हुई अवस्था में रोग जटिल हो जाता है व इसका हल निकालना कठिन प्रतीत होता है। हमारे आध्यात्मिक व चिकित्सा ग्रन्थों के आधार पर रोग का समाधान पाॅंच स्तरों पर खोजना होता है।
1. अन्नमय कोष के स्तर पर
     इस स्तर पर हम शरीर की सात धातुओं को जितना मजबूत कर सके उतना अच्छा होगा। आयुर्वेदिक मान्यता के अनुसार जब शरीर कमजोर होना प्रारम्भ होता है तभी रक्त चाप में असमान्यता उत्पन्न होती है। शरीर की कमजोरी की पूर्ति हेतु अधिक रक्त के संचारण के लिए तीव्र वेग से रक्त फेंका जाता है व रक्तचाप बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए खेलते समय सामान्यतः धड़कन व रक्तचाप बढ़ जाता है। क्योंकि अधिक उळर्जा अधिक सामथ्र्य की उस आवश्यकता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि जो दुबला-पतला है वह रक्तचाप का शिकार नहीं होता। यह मान्यता त्रुटिपूर्ण है। शरीर की धातुएॅं जिसकी भी कमजोर होंगी वही रक्तचाप से पीडि़त होगा। चाहे शरीर मोटा हो या पतला। मोटे शरीर में कोलेस्ट्राॅल के जमने की सम्भावना अधिक होने से प्रायः मोटे लोगों को रक्तचाप अधिक होता है। धातुओं के पोषण का पूरा विज्ञान आयुर्वेद ने दिया है। अन्नमय कोष के स्तर पर रक्तचाप नियन्त्रण हेतु नमक कम लेना प्रायः सर्वविदित है। इस दिशा में लेखक ने 100 महत्त्वपूर्ण सूत्रों का संकलन किया है। कृपया ‘स्वास्थ्य के सौ अनमोल सूत्र’(100 Golden Rules for Health ) पढ़ें।
2. प्राणमय कोष
     प्राणमय कोष के स्तर पर रक्तचाप का उपचार करने के लिए दो बातें बहुत आवश्यक हैं। पहला ब्रह्मचर्य की उचित पालन दूसरा उदर श्वसन। श्वास को गहरा भरते हुए नाभि तक ले जाएॅं। इसमें बायो फीड बैक विधि का प्रयोग भी किया जा सकता है। आप एक बार मशीन से रक्तचाप नोट करें। इसके उपरान्त उदर श्वसन करें अर्थात् साॅंस पेट में नीचे गहराई तक ले जाएॅं। 10-15 मिनट उदर श्वसन कर पुनः ठण्च्ण् नोट करें। उसमें कुछ न कुछ कमी अवश्य आएगी।
     व्यक्ति के कर्मो का सीधा प्रभाव उसके प्राणमय कोष पर पड़ता है। अतः कर्मों की पवित्रता आवश्यक है। जिनका प्राणमय कोष मजबूत होता है वो बहुत उल्टे काम करने पर भी स्वस्थ रहते हैं व जिनका प्राणमय कोष कमजोर होता है वो थोड़ से गलत कार्यों से ही रोगी हो जाते हैं। पुराणों में असुरों के लोगों को सतनाने व दुराचार करने का अनेक कहानियाॅं आती हैं। परन्तु ये असुर लम्बे समय तक पहले तप भी तो करते हैं जिससे उनका प्राणमय कोष मजबूत हो जाता है। दीपक को जलाना व यज्ञ कराना प्राणों में सन्तुलन उत्पन्न करता है वातावरण के दूषित प्राणों से हमारी रक्षा करता है।
     निर्भयता प्राणमय कोष को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। गलती पकड़े जाने का भय व्यक्ति के प्राणमय कोष को कमजोर बनाता है। अतः हमेशा सन्मार्ग पर चलें   (Always follow the righteons Truth)  जिस व्यक्ति का प्राणमय कोष जितना अच्छा होता है वह उतना निर्भय होता है व जो जितना निर्भय होता है उसका प्राणमय कोष उतना मजबूत होता है। आत्मा की अमरता मृत्यु भय व अन्य डरों में कमी लाता है। अतः आत्मा की अमरता का अभ्यास करें। (पढ़े ‘मैं क्या हूॅं’ "what am I" by Shri Ram Sharma)। पूर्व में राणा प्रतापतात्याॅं टोपेलक्ष्मी बोई आदि वीरों व अनेक )षियों का प्राण बड़ जानदार होता था। परन्तु आज व्यक्ति का प्राण दुर्बल होता जा रहा है। कहते हैं ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ अर्थात् जो वीर है जिसका प्राण मजबूत है वही स्वस्थ है वही धरती का भोग अर्थात् सुख ले सकता है। दुर्बल प्राण अर्थात् रोगी का जीवन सुख-चैन से रहित हो जाता है।
      प्राणमय कोष को मजबूत करने का विज्ञान ‘प्राणायाम विद्या’ के अन्तर्गत आता है। आज के युग में यह विद्या लुप्तप्रायः ही है। या यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति की जीवन शैली इस प्रकार बनती जा रही है कि उसका प्राण दुर्बल हो गया है। इस पर एक स्वतन्त्र पुस्तक की आवश्यक है।
3. मनोमय कोषः
     यद्यपि विभिन्न प्रकृति और व्यक्तित्व वाले मनुष्य उच्च रक्तचाप से पीडि़त हे।उनमें से एक विशेष प्रकार के व्यक्ति ही अपेक्षाकृत अधिक संख्या में हैं। ये लोग प्रतिस्पर्धीआक्रामकमहत्त्वाकांक्षी और तनावपूर्ण जीवन पद्यति वाले व्यक्तित्व थे। अधिकतर रेागी वो हैं जो स्वार्थजीवी हैंजो सफलता की सीढि़याॅं तूफानी रफ्तार से चढ़कर शिखर पर पहुॅंचने को बेताब थे। यदि चिंताओं और उद्विग्नताओं से आपका जीवन भरा हैजो आपको क्रोधिततनावग्रस्त और दुःखी बना रही हैंतो आप उच्च रक्तचाप को जीवन में आमन्त्रण दे रहे हैं। अतः आपको इसके प्रति सजग रहना चाहिए।
     व्यक्ति का महत्त्वाकांक्षी स्वभाव व असंतुलित भावनाएॅं मुख्य रूप् से मनोमय कोष के अन्तर्गत रक्तचाप के प्रमुख कारण हैं। अब प्रश्न उठता है कि इससे बचा कैसे जाए? 20-25 वर्ष तक आते - आते मनुष्य के स्वभाव का निर्माण हो चुका हेाता है। दूसरी कठिनाई यह है कि युवावस्था में वह जिस हवा में बह रहा होता हैसचेत भी नहीं होना चाहता क्योंकि उस समय रोग तो द्वार पर दस्तक दे देता है पर उसके दुष्परिणाम आते-आते 10-15 वर्ष लग जाते हैं। लगभग 40 वर्ष की आयु पर व्यक्ति को ज्ञात होता है कि वह एक ऐसे मकड़जाल में फंस गया जहाॅं से निकलपाना सरल नहीं है। न तो स्वभाव को बदलना आसान है न हि शरीर को कम रक्तचाप पर चलाना। धीरे-धीरे इसका असर जब दूसरे अंगों पर दिखाई देता है तो व्यक्ति भयभीत होता है।
     इसका समाधान एक ही है कि व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाए। समय की विडम्बना है कि आज हमारी शिक्षा पद्यति में आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समावेश नहीं है। इसमें सर्वप्रथम व्यक्ति निष्काम कर्मयोग का पाठ सीखे। जितना व्यक्ति निःस्वार्थ होता जाएगामानसिक शान्ति का केन्द्र बनता जाएगा। वैसे तो मानसिक शान्ति के अभ्यास के बहुत प्रकार के साधन समाज में देखने को मिलते हैं परन्तु निष्काम कर्मयोग उन सबमें स्थाई होने के कारण सर्वोत्तम है। व्यक्ति अधिक से अधिक मोह रहितआसक्ति रहित जीवन का अभ्यास करे। वैराग्य इसी को कहा जता है। राजा जनक विदेह कहलाते थे क्योंकि वह अपनी देह से भी निरक्त हो चुके थे।
     एक बार सिकन्दर भारत पर आक्रमण की तैयारी कर रहा था। अपने गुरु से कहता है -‘भारत अमूल्य रत्नों की खान है बताएॅं आपको कौन सा रत्न लाकर दूॅं।’ गुरु उत्तर देते हैं - कि भारत का सबसे अनमोल रत्न ‘ब्रह्मज्ञान’ हैउन्हें ब्रह्मज्ञानी चाहिए। सिकन्दर पूछता है कि उसकी क्या पहचान है तो उत्तर मिलता है ब्रह्मज्ञानी वह है जो अपने शरीर का मोह छोड़ चुका हो एवं पूर्ण निर्भय हो।
     सिकन्दर ने अपनी सेना में भारत में ऐसे व्यक्ति को खोजने का आदेश दिया जिसमें गुरु को वह भेंट दी सके। सिकन्दर की सेना जहाॅं से भी गुजरती वहाॅं भय के मारे गाॅंव के गाॅंव खाली हो जाते थे। सेना तीव्र गति से बढ़ रही थी। मार्ग में एक व्यक्ति मजे से धूप सेंक रहा था। सैनिकों ने उससे पूछा-”यहाॅं मार्ग में क्यों पड़े हो क्या तुम्हें सिकन्दर महान से भय नहीं लग रहा“ उस व्यक्ति ने उत्त्र दिया - ”सिकन्दर तो स्वयं ही अपनी मृत्यु की ओर बढ़ रहा हैउससे भय कैसा।“ सिकन्दर ने उसको भयभीत करने के अनेक प्रयास किए परन्तु वह निर्भय रहा। सिकन्दर की समझ में आ गया कि यही ब्रह्मज्ञानी है जिसकी गुरु को तलाश थी।

     परन्तु आज हमारा मनोमय कोष बात-बात पर अशान्त होने लगा है। प्राचीन काल में मनोमय कोष इतना मजबूत होता था कि व्यक्ति आजीवन आदर्शों व सिद्धान्तों से भरा निर्भय व शान्त जीवन जीता था। सद्भावप्रेमउच्च व्यक्तित्व का धनी होता था। जिसके व्यक्तित्व में जितनी गहराई होगी उसका मनोमय कोष उतना सुदृढ़ होगा। आज हम धन कमाने के चक्कर में अपना चरित्र अपना मनोमय कोष खराब करते जा रहे हैं। दूसरों को नीचा दिखाने के लिए आपसी खींचतान व ईष्र्याद्वेष बढ़कर रक्तचाप को नियन्त्रण दे रहा है।