Vishwamitra & Author


मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत, सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्मबल वर्धक तथा सनातन धर्म का संवाहक - एक लोकप्रिय प्रस्तुति।          यदि मनुष्य के पास कोई ऐसा आदर्श नहीं है, जिसके लिए वह मर-मिट सके तो उसके पास ऐसा कुछ भी सार्थक नहीं है जिसके लिए वह जीवन जीए।
Vishwamitra is a Hindi Sanskrit word. Vishwa means "The world” and Mitra means "The friend". When we combine these two words we get a simple meaning that is "The Friend of World".    Author: Dr. R. K. Aggarwal (Ph.D. Computer Science)

R. K. Aggarwal was born in India (15th Sept. 1969) and obtained his B. Tech. degree from Computer Science Department of KNIT, Sultanpur in 1990. Then he joined the Department of Computer Engineering, National Institute of Technology, Kurukshetra, as a Lecturer and Associate Professor during 1990 and 2007 respectively. He completed his M. Tech. in 2006 and  Ph.D. in 2014 from the same institute. He has written 4 Hindi books "सनातन धर्म का प्रसाद",  युग ऋषि श्रीराम जी का जीवन संघर्ष और हमारी भूमिका, "साधना समर -चुनौतियाँ और समाधान" or "A Guide to Spiritual Transformation" and "100 Golden Rules for Health"He has also been associated with social welfare activities of several international organizations like Gayatri Pariwar, R.S.S. and Bhakti Vedanta Institute. He is willing for the realization of the highest aim of life upon earth. He has created two blogs one in English and other in Hindi. He is awarded by Shiksha Ratan Puruskar and Peace Education Promoter award (TPRF).

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साहित्य ही संस्कृति का दर्पण होता हैलेखक तो सकल राष्ट्र का धन होता है।
अनुभूतियों के गहन हिमालय से सदासाहित्य की गंगा का सृजन होता है।
जिस देश के हाथों की कलम टूटी होउस देश का निश्चित पतन होता है
            विश्वामित्र - एक आध्यात्मिक क्रान्ति
जब भी इस धरती पर पाप, पीडा अधर्म इस हद तक बढ जाता है कि धरती मां का अस्तित्व ही खतरे में आ जाए, विनाश की काली घटांए चारों ओर छा जाएं, ऐसे विषम समय में देवात्माएं धरती पर मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए एक सशक्त भूमिका निभाती रही हैं इस प्रक्रिया को अवतार की संज्ञा दी जाती रही है। आज भी हमारी भारत मां और सम्पूर्ण विश्व इस त्रासदी के दौर से गुजर रहा है। इतनी वैज्ञानिक प्रगति होने के उपरान्त भी मनुष्य का सुख, चैन, स्वास्थय छिनता जा रहा है। बहुत भाग दौड करने पर भी मानव को अपने बचाव का कोर्इ रास्ता नजर नहीं आ रहा है। अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए कोर्इ शराब का सहारा ले रहा है तो कोर्इ आत्महत्या अथवा आतंकवादी बनकर सामूहिक हत्याएं कर रहा है। यह सब मानव के भीतर अपनी निराशा एवं ऋणात्मक विकृतियों का ही परिणाम है।
इन सब समस्याओं का एक ही समाधान है। जितनी तेजी से विज्ञान का विकास हुआ है उतनी ही तीव्रता से मानव का आध्यात्मिक रूपान्तरण हो सके। जिन्हें दिव्य नेत्र अथवा साधना की अनुभूतियां है वे जान रहे हैं कि हिमालय की देवसत्ताओं ने अपने तपोबल से धरती को एक नए आयाम की ओर मोड दिया है। ऋषियों के इस वैज्ञानिक प्रयोग से आने वाले समय में मनुष्य अपने ऊपर एक प्रकार का भारी दबाव महसूस करेगा जो जबरन उसकों आध्यात्मिक साधनाओं की ओर मोडेगा।
आध्यात्म क्या है? किस प्रकार की साधना आज के मानव की प्रवृति के अनुकूल है? साधना के उपयुक्त मनोभूमि का निर्माण करना परम आवश्यक है और यदि दुर्भाग्यवश रफ्तार तेज करने के चक्कर में साधना मार्ग पर चलते - चलते किसी भंवर अथवा कठिनार्इ में फंस जाए तो निवारण के उपाय क्या हैं? इन्हीं बिन्दुओं पर लेखक ने वर्षो खोजबीन करने का प्रयास किया है। साधना रूपी समुद्र अथाह है उसमें से मोती बीनना कठिन कार्य है। अनेक महामानवों ने इसका अन्वेषण करने में अपने जीवन की आहुति दे दी। लेखक उनकी बराबरी या तुलना करने का दुस्साहस नहीं कर सकता न ही किसी उच्च स्तरीय सफलता का दावा करता है। अपितु इस क्षेत्र में रूचि होने के कारण एक बुद्धिजीवी के नाते विनम्रता पूर्वक अपने अनुभव अपनी खोज को सबके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता है।
आशा है यह प्रस्तुति आध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों के लिए एक सहारा बनेगी व जीवन में आशाओं व खुशियों का संचार करेगी। अटके हुआ को आत्मबल प्रदान करेगी व भटके हुओं का उचित मार्ग दर्शन करेगी, इन्हीं भावनाओं के साथ देवात्मा हिमालय के पावन चरणों में मेरा प्रणाम। अन्त में ऋषि आत्मओं से निवेदन है कि वो ही सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान दान, प्राण दान, ब्रहम ज्ञान प्रदान करने में सक्षम है। जीवन के अनेक तूफानों में जिनके चरण कमल ही एक मात्र शरण है वो ही इस संसार को पार करवाने वाली नौका है, उनकी कृपा से ही अग्नि के समान जलाने वाले संसारिक दुखों का ही अन्त सम्भव है। ऐसी समर्थ सत्ता हमें अपने शरण प्रदान करें यही हम सब अबोध बालकों का उनसे निवेदन है करूण क्रन्दन है।
जिन चरणों का पर्श प्राप्त कर, जड़ में प्रकटे अतिमन-चेतन
खुले चेतना नील-गगन में, करती मानस-सीमा-लंघन।।
जिनकी स्वर्णिम छाया में पल, श्वेत बना काजल-सा जीवन।
उसका पुष्पण आज सजा कर, उन चरणों में करता अर्पण।।
जय हिन्द ! जय भारत !
मेरा आहृान युवा भारत के प्रति है। युवाओं को ही नूतन विश्व का निर्माता बनना है, न कि उन्हें जो पश्चिम के प्रतियोगीतापूर्ण व्यक्तिवाद, पूँजीवाद अथावा भौतिकवाद साम्यवाद को भारत का आर्दश मानते है, और न उन्हें जो प्राचीन धार्मिक आड़म्बरों में उलझे पडें है। मैं उन सभी को आमान्त्रित करता हुँ जो एक महानतम आर्दश के लिए अपना जीवन न्यौछावर करने के लिए तैयार है। इस धरा पर उज्जवन भविष्य लाने के लिए अपनी आत्मा को रूपातरण करने के लिए स्ंवय को प्रस्तुत कर सकते है। मात्र इसी लक्ष्य में जीवन का कल्याण निहित है, इस सत्य को स्वीकारते हुए, श्रम करते हुए, मस्तिष्क और हृदय को स्वतन्त्र ( अप्रभावित ) रखते हुए निरन्तर संघर्ष कर सकते है वे ही नवयुग लाएँगें।
Maharishi Arvind
      जब कोर्इ आत्मा मंगलमय भगवान् से अपना संपर्क बनाना चाहती है अथवा मंगलमय भगवान् जिस आत्मा को अपनी शरण में लेना चाहते है तो आत्म कल्याण, लोक कल्याण की पावन प्ररेणाँए उस आत्मा के अन्त:करण में उदय होने लगती है। वह र्इश्वरीय कार्य को पूरा करने के लिए समर्पित होकर भावना पूर्वक समयदान, अंशदान देना प्रारंभ कर देता है। यही समर्पण आत्मदान के रूप में अपनी पूर्णता तक पहुँचता है। ऐसे ही 24,000 आत्मदानियों की रूपरेखा हिमालय के ऋषियों के द्वारा तैयार की जा रही है। परमब्रह्म परमात्मा की शक्ति को धारण किए हिमालय के उन महातपस्वियों के आगे असम्भव कुछ भी नहीं है। भारत माता व धरती माता क परित्राण का संकल्प लेकर जब वो अपन शक्ति प्रयोग करना प्रारंभ करते है तो इसे महाकाल के तांड़व नृत्य की संज्ञा दी जाती है। ऐसा ही एक प्रयोग उन्होनें भारत की स्वतन्त्रता के लिए श्री अरविंद व श्री रमण को माध्यम बनाकर किया जिससे हजारो बलिदानी पैदा हो गए। इस बार आत्मदानियों का निर्माण होना है क्योंकि युग का निर्माण आत्मदानियों के बलबूते पर होना है। जब लेखक के हृदय में इस प्रकार की पवित्र भावनाओं का संचार हुआ तो लेखक को सनातन धर्म की पुर्नस्थापना के लिए कार्य करने को कहा गया।
सनातन धर्म की आज क्या स्थिति है? कौन इसके लिए आगे  सकता है? इन बिन्दुओं पर लेखक ने गहरार्इ से सोच विचार किया है। इसके लिए तीन वर्र्ग के लोग चाहिए। पहले वर्ग में पूर्ण आत्मदानी लोग नेतृत्व हेतु चाहिए। ऐसे लोग यद्यपि कम मिलेंगे परंतु बहुत शक्तिशाली होगें आत्मदान की भूमिका में जो भी अग्रसर होगा, सनातन धर्म के रहस्य उसके भीतर से प्रस्फुटित होगें। ये लोग श्रेष्ठतम स्तर के साधक होगें सिद्ध पुरूष, महापुरूष होगें। सूक्ष्म व कारण शरीर में विद्यमान हिमालय के ऋषियों से सम्पर्क बना पाने में ये ही आत्माँए सक्षम होंगी धरती पर हिमालय के ऋषियों का सीधा प्रतिनिधित्व करेंगी। उनकी विश्वव्यापी योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता भी इन्ही आत्मदानी आत्माओं में होगी। दूसरे वर्ग में वो आत्माएँ आँएगी जो साधना में रूचि लेंगी तथा तप के द्वारा अपने पूव जन्मों के कुसंस्कारों व प्रारब्ध को काटने का प्रयास करेंगीं संसारिक वासनाओं, तृष्णाओं, ऐषणाओं से संघर्ष कर साधना में प्रगति करने की इच्छुक होंगी। ये पहले वर्ग की सहयोगी आत्माँए होंगी। यद्यपि हिमालय के ऋषियों का संदेश, संरक्षण इनको भी मिलेंगा परंतु ये बहुत स्पष्ट उनका संदेश नहीं सुन पाँएगी। अत: मूलत: इन सभी बातों में ये पहले वर्ग पर निर्भर रहेगी। निष्काम कर्म योगी की तरह ये सनातन धर्म का प्रसाद जन-जन तक बाँटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाँएगी। तीसरे वर्ग में वो आत्माँए होगी जो साधना करने की मन: स्थिति में तो नहीं होगी परंतु सनातन धर्म के सिद्धान्तों को ठीक से समझने, अनुसरण करने में रूचि दिखाँँएगी। अपनी कष्ट कठिनाइयों के निराकरण के लिए मूलत: ये सनातन धर्म की शरण में आँएगी। इनके कष्टो को दूर करने में व इनको सनातन धर्म का सही स्वरूप समझाने में उपरोक्त दोनों वर्ग की आत्माँए सहायता करेगी। आज समाज की स्थिति भयावह है।
सनातन धर्म के सिद्धान्तों में जिनकी रूचि हो ऐसे लोग बहुत ही कम मिलते है। अधिकाँश लोगों ने सनातन धर्म के नाम पर कुछ मन गढन्त मान्यताँए अपना रखी है उन्हीं को आँख बन्द कर लकीर पीटते रहते है। सोचते है कि इनसे उनकी मनोकामनाँए पूरी हो जाएँगी अथवा उनके संकटो, कष्टो का निवारण हो जाएगा। एक मन्दिर से दूसरे मन्दिर, एक देवता से दूसरे देवता, मजारो, भाँति-भाँति के मंत्रो तंत्रो, टोने टोटको आदि में भटकना आज के लोगों को कार्य है। जबकि वास्तव में सनातन धर्म पूर्णत: नियमबद्ध है यदि आप सनातन धर्म के नियमों केा न समझकर अपने मन से हिसाब से या सामाजिक मान्यताओं के हिसाब से बिना बुद्धि विवेक का प्रयोग किए दुखी कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे है तो इसमें किसका क्या दोष? आइए अब हम भटकना छोडे। श्री राम स्ंवय चलकर केवट व भीलनी के द्वार आए है, कृष्ण की मधुर बाँसुरी बज रही है, बुद्ध की सारगर्मित वाणी गूँज रही है, शिव का डमरू बज रहा है हिमालय के ऋषियों के संदेश के रूप में। यही कुछ समझाने के लिए यह प्रस्तुति लिखी गयी है। अपने धन का, पद प्रतिष्ठा का, मिथ्या ज्ञान का अहंकार छोडकर इस प्रसतुति में वर्णित संदेश को ध्यान पूर्वक पढिए, बार-बार पढ़िए, उस पर विस्तृत मनन चिन्तन करिए, उसको अपनी अन्तरात्मा में धारण करिए, उसी आधार पर अपने जीवन की रीति नीति बनाइए व जिसमें जितना साहस, आत्मबल, जप-त्याग करने की क्षमता हो उस आधार पर उपरोक्त वर्णित तीनों वर्गों में से एक वर्ग में सम्मिलित होकर हिमालय के ऋषियों के प्रसाद को ग्रहण करिए उनके कृपा पात्र बनिए गिद्ध-गिलहरी, रीछ-वानर की तरह ग्वाल-बालों, गोपियों, अर्जुन की तरह, बौद्ध परिव्राजकों की तरह, साथ में यदि कोर्इ किसी प्रकार की उत्सुकता हो तो उसे लेखक के साथ बाँटने में भी बिल्कुल न हिचकिए।

प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जिन आध्यात्मिक शक्तियों, महानुभावों, शुभ चिंतकों एवं मित्रों के अमूल्य सहयोग, प्रोत्साहन एवं समर्थन से यह देव कार्य सम्पन्न हुआ, उन सभी के प्रति हम अपना हार्दिक आभार प्रकट करते हैं। N.I.T. कुरुक्षेत्र के कंप्यूटर विभाग से इस कार्य में बहुत सहयोग मिला है; विशेष रूप से हमारे विभाग के M.Tech के छात्र श्री योगेश सोनी (2012-13) द्वारा blog के शुभारम्भ व Technical Support के लिय किय गए प्रयास सराहनीय हैं। परम पिता परमात्मा से विन्रम प्रार्थना है कि इसी प्रकार हम पर उनका अनुग्रह बरसता रहें और हम आजीवन श्रेष्ठ कार्य करते रहें।

इस ब्लाग के माध्यम से योग साधना, धर्म कर्म, सुख दुख, पाप पुण्य, जीवन मरण, स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद, आत्म बल एवं ब्रह्माज्ञान जैसे विषयों पर शास्त्रों, सिद्ध पुरुषों, विचारकों एवं धर्मोपदेशको के स्फुट विचार एवं सिद्धान्त सूत्र रूप में आचरण में लाने की दृष्टि से संग्रह रूप में प्रस्तुत करने का अल्पज्ञ प्रयास किया गया हैं।

इसके पाठक जीवन को सुधारने एवं संवारने का प्रयत्न अवश्य करेगे। यदि हम इस आत्माबलोकन एवं आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया में सफल हो सके तो हमारा अपना जीवन सफल होगा व साथ-साथ अपने सम्पर्क में आने वालो को भी अच्छी प्रेरणा व मार्गदर्शन मिलेगा।                                           आपका भार्इ - राजेश अग्रवाल

यदि कोर्इ संस्था अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा देने के लिए एक विद्यालय खोलती है तो एक जेलखाना बन्द होता है।
इन निबंधों को लिखने का ढंग निराला है। कारण ये सब निबंध किसी लेखक के द्वारा, अथवा उस व्यक्ति के द्वारा नही लिखे गये हैं, जिसमें लिखने की योग्यता या प्रतिभा हो, वस्तुत: प्ररेणाएं हैं, जो जीवन के सामान्य काज-कर्म में मुझे पकड़ लेती थीं और शब्दों में रूपायित करने के लिए प्रेरित उत्साहित करती थीं, कभी-कभी दबाव भी ड़ालती थीं।
इन प्ररेणाओं को अंकित करने का मेरा अभिप्राय सिर्फ इतना ही था कि जो आत्म-सत्य में नहीं जागे हैं, उन्हें जगा दिया जाये। जिनमें अभिप्सा नहीं है, उनमें उत्पन्न कर दी जाए। जिनकी आत्मा पर पर्दा छा गया है, वह हटा दिया जाए। व्यक्ति आत्मा का खोजे, उसमें निवास करे, जीवन पथ पर उसके इंगित से चले। जीवन के रहस्यों को जाने, अपनी मूल सत्ता को पहचाने, जीवन-स्वामी से उसका परिचय हो और वह उनको समर्पित होकर जीवन यापन करे।
वह स्वर्णिम दिवस संसार शीघ्र ही देखेगा जब मानव मात्र जागेगा। आत्म-विकास के पथ पर बढेगा। सामान्य स्तर से ऊपर उठेगा। उच्च चेतनाओं में विचरण करेगा। दिव्य जीवन में निवास को अपने लक्ष्य के रूप में चुनेगा। प्रभु को समग्र सत्ता का समर्पण उसका पथ होगा। अज्ञान का आवरण गिरेगा और सब ज्योतिमर्य हो उठेगा।

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